भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन को मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िला की तहसील ठियोग की ग्राम पंचायत सरिवन के छोटे से गाँव मझौली के रहने वाले नरेश शर्मा भी ऐसे ही प्रेरणादायक व्यक्तित्वों में शामिल हैं। आज समाज में उन्हें एक जीवनरक्षक रक्तदाता के रूप में जाना जाता है। साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने मानवता की राह को अपना जीवन-मंत्र बनाया और वर्षों से निस्वार्थ भाव से रक्तदान कर असंख्य लोगों को जीवनदान दिया है।
हाल ही में उन्होंने मध्यप्रदेश की पवित्र नगरी उज्जैन में भगवान श्री महाकाल की दिव्य छत्रछाया में अपना 127वां स्वैच्छिक रक्तदान किया। यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज को प्रेरित करने वाला संदेश भी है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो एक व्यक्ति भी हजारों लोगों के जीवन में आशा का प्रकाश जगा सकता है।
छोटे से गाँव से मानवता की बड़ी राह
नरेश शर्मा का जन्म हिमाचल प्रदेश के एक साधारण परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े नरेश ने बचपन से ही समाज में सहयोग और सेवा की भावना देखी और सीखी। गाँव का वातावरण सरल था, लेकिन वहाँ लोगों के बीच अपनापन और सहयोग की परंपरा गहरी थी। यही संस्कार उनके व्यक्तित्व की नींव बने।
समय के साथ जब उन्होंने समाज में बीमारियों, दुर्घटनाओं और रक्त की कमी के कारण लोगों को पीड़ित होते देखा, तब उनके मन में एक संकल्प जन्मा—मानवता की सेवा के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे किसी की जान बच सके।
यही विचार आगे चलकर उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।
रक्तदान का सफर – सेवा का सतत संकल्प
नरेश शर्मा ने लगभग तीन दशक पहले रक्तदान की शुरुआत की थी। उस समय बहुत कम लोग स्वेच्छा से रक्तदान करते थे और समाज में कई तरह की भ्रांतियाँ भी प्रचलित थीं। लेकिन उन्होंने इन सब बाधाओं की परवाह किए बिना रक्तदान को अपनी जीवन-शैली बना लिया।
धीरे-धीरे उनका यह प्रयास एक अभियान में बदल गया। वे स्वयं रक्तदान करते रहे और साथ-साथ समाज में भी जागरूकता फैलाते रहे। आज उनका रक्तदान का आँकड़ा 127 बार तक पहुँच चुका है।
यह संख्या केवल एक उपलब्धि नहीं है। यह उन सैकड़ों-हजारों लोगों के जीवन से जुड़ी कहानी है जिनकी जान समय पर मिले रक्त की वजह से बच सकी।
नरेश शर्मा का मानना है कि:
“रक्तदान सबसे बड़ा महादान है, क्योंकि यह सीधे किसी की साँसों को जीवन देता है।”
125वां रक्तदान – IGMC शिमला ब्लड बैंक
नरेश शर्मा ने अपना 125वां रक्तदान 24 अगस्त 2025 को इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) शिमला के ब्लड बैंक में किया था। IGMC हिमाचल प्रदेश का प्रमुख चिकित्सा संस्थान है, जहाँ प्रतिदिन अनेक मरीजों को रक्त की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में रक्तदाताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
126वां रक्तदान – बिलासपुर के बच्छरेटू में
इसके बाद 23 नवंबर 2025 को बिलासपुर जिले के बच्छरेटू में आयोजित रक्तदान शिविर में उन्होंने अपना 126वां रक्तदान किया। यह शिविर समाज में रक्तदान जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। इस अवसर पर नरेश शर्मा ने युवाओं को कहा कि:
“यदि हर स्वस्थ व्यक्ति वर्ष में कम से कम एक बार रक्तदान करे, तो देश में किसी भी मरीज को रक्त की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा।”
उनकी इस प्रेरणादायक बात ने वहाँ उपस्थित युवाओं को गहराई से प्रभावित किया।
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हिमाचल प्रदेश के स्वैच्छिक रक्तदाता नरेश शर्मा ने IGMC शिमला ब्लड बैंक में अपना 125वां रक्तदान कर युवाओं को मानव सेवा के इस पवित्र कार्य के लिए प्रेरित किया। पढ़ें पूरी प्रेरणादायक कहानी।
127वां रक्तदान – महाकाल की नगरी उज्जैन में

नरेश शर्मा के रक्तदान जीवन का एक अत्यंत प्रेरणादायक अध्याय तब जुड़ा जब उन्होंने मध्यप्रदेश की पवित्र नगरी उज्जैन में भगवान बाबा महाकाल की दिव्य छत्रछाया में अपना 127वां स्वैच्छिक रक्तदान किया।
28 फरवरी 2026 को उज्जैन स्थित चरक अस्पताल (GOVT. MOTHER & CHILD HOSPITAL, UJJAIN) में आयोजित रक्तदान कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए अनुभवी और शतकवीर रक्तदाताओं ने भाग लिया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य समाज में स्वैच्छिक रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाना और लोगों को मानवता की सेवा के लिए प्रेरित करना था।
यह रक्तदान कार्यक्रम “मिशन रक्तक्रांति हिंदुस्तान” के सौजन्य से आयोजित किया गया था। इस अभियान की प्रेरक टैग लाइन है —
“घर-घर रक्तदाता, हर घर जीवनदाता।” इस अभियान का व्यापक उद्देश्य पूरे भारत को स्वैच्छिक रक्तदान की भावना से जोड़ना है, जिससे “घर-घर रक्तदाता, हर घर जीवनदाता” का संकल्प साकार हो सके और देश में रक्त की कमी पूरी तरह समाप्त की जा सके।
इस कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश से नरेश शर्मा के साथ-साथ हरियाणा, गुजरात और मध्यप्रदेश से आए कई अनुभवी रक्तदाता भी शामिल हुए। सभी ने मिलकर रक्तदान करते हुए यह संदेश दिया कि मानवता की सेवा के लिए न तो सीमाएँ मायने रखती हैं और न ही प्रदेश—जरूरी है तो केवल सेवा की भावना।
महाकाल की नगरी में किया गया यह 127वां रक्तदान नरेश शर्मा के लिए केवल एक सामाजिक सेवा का कार्य नहीं था, बल्कि यह उनके लिए एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव भी था। उन्होंने इसे भगवान बाबा महाकाल के आशीर्वाद और प्रेरणा का परिणाम बताया, जिसने उन्हें मानवता की इस पवित्र सेवा के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने की शक्ति दी।
समाज में “जीवनरक्षक” के रूप में पहचान
लगातार और निस्वार्थ सेवा के कारण आज नरेश शर्मा को समाज में “जीवनरक्षक रक्तदाता” के रूप में जाना जाता है।
जब भी किसी अस्पताल, दुर्घटना पीड़ित या थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे को रक्त की आवश्यकता होती है, तो नरेश शर्मा तुरंत सहायता के लिए तैयार रहते हैं। कई बार उन्होंने आपातकालीन परिस्थितियों में भी रक्तदान कर लोगों की जान बचाने में योगदान दिया है।
उनकी यही तत्परता और सेवा भावना उन्हें समाज में विशेष पहचान दिलाती है।
हजारों लोगों को किया प्रेरित
नरेश शर्मा केवल स्वयं रक्तदान ही नहीं करते, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में हजारों लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित भी किया है।
वे विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों, जागरूकता अभियानों और रक्तदान शिविरों में जाकर लोगों को रक्तदान के महत्व के बारे में बताते हैं।
उनका मानना है कि:
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रक्तदान सुरक्षित है
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इससे स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता
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और यह किसी भी व्यक्ति के जीवन को बचा सकता है
उनकी प्रेरणा से अनेक युवाओं ने पहली बार रक्तदान किया और बाद में नियमित रक्तदाता बन गए।
“जीवनरक्षक पुस्तक” के लेखक
नरेश शर्मा केवल एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं हैं, बल्कि वे “जीवनरक्षक” पुस्तक के लेखक भी हैं।
यह पुस्तक रक्तदान और मानव सेवा को समर्पित है। इसमें उन्होंने अपने अनुभवों, प्रेरक घटनाओं और समाज में सेवा की आवश्यकता के बारे में विस्तार से लिखा है।
इस पुस्तक का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि रक्तदान केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं बल्कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा है।
मिशन रक्तक्रांति हिंदुस्तान – रक्तदान को जन-आंदोलन बनाना

“मिशन रक्तक्रांति हिंदुस्तान” एक ऐसा सामाजिक अभियान है जिसका उद्देश्य स्वैच्छिक रक्तदान को पूरे भारत में जन-आंदोलन के रूप में स्थापित करना है। इस मिशन का मूल विचार यह है कि समाज का हर स्वस्थ नागरिक रक्तदान के महत्व को समझे और समय-समय पर स्वेच्छा से रक्तदान करके किसी जरूरतमंद की जीवन रक्षा में अपना योगदान दे।
आज भी देश में अनेक ऐसे मरीज हैं जिन्हें समय पर रक्त न मिलने के कारण कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या को समाप्त करने के लिए इस अभियान के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि रक्तदान एक सुरक्षित और महान मानव सेवा है।
मिशन की प्रेरक टैगलाइन “घर-घर रक्तदाता, हर घर जीवनदाता” इस विचार को और मजबूत बनाती है। इसका लक्ष्य है कि भारत के हर गाँव, हर शहर और हर परिवार में रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़े और लोग इसे अपना सामाजिक कर्तव्य समझें।
इस अभियान के माध्यम से हजारों लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया जा चुका है और यह प्रयास निरंतर आगे बढ़ रहा है, ताकि देश में किसी भी जरूरतमंद को रक्त की कमी के कारण जीवन संकट का सामना न करना पड़े।
युवाओं के लिए प्रेरणा
आज के समय में जब समाज में अनेक चुनौतियाँ हैं, ऐसे में नरेश शर्मा जैसे लोग युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
उनका जीवन यह सिखाता है कि:
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सेवा के लिए बड़े साधनों की आवश्यकता नहीं होती
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केवल एक सच्चा संकल्प ही पर्याप्त होता है
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और एक व्यक्ति भी समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है
निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िला की तहसील ठियोग की ग्राम पंचायत सरिवन के छोटे से गाँव मझौली से निकलकर 100 से अधिक बार रक्तदान कर “Centurion Blood Donor” की सूची में अपना नाम दर्ज कराना, और उसके बाद भी निरंतर मानवता की सेवा करते हुए 127वीं बार रक्तदान करना, वास्तव में एक अद्भुत और प्रेरक उपलब्धि है। यह केवल संख्या नहीं, बल्कि सैकड़ों-हजारों जीवनों से जुड़ी आशा और विश्वास की कहानी है।
नरेश शर्मा का यह जीवन-सफर हमें याद दिलाता है कि मानवता की सबसे बड़ी पूजा वही है जिसमें किसी की पीड़ा कम हो और किसी की साँसें बच सकें।
रक्तदान करें, जीवन बचाएँ — यही सच्ची सेवा है।
A Blood Donation Message by Blood Donor Naresh Sharma from the Sacred Land of Baba Mahakal, Ujjain
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