हिमाचल प्रदेश के प्रेरणादायक रक्तदाता नरेश शर्मा का जीवन-वृतांत
शिमला ज़िला की तहसील ठियोग की ग्राम पंचायत सरिवन के छोटे से गाँव मझौली के रहने वाले नरेश शर्मा आज समाज में जीवनरक्षक के रूप में जाने जाते हैं। गाँव की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने मानवता की राह को अपनी जीवन-दिशा बनाया। उनके भीतर बचपन से ही सेवा-भाव, करुणा और त्याग की ज्योति प्रज्वलित थी। यह ज्योति समय के साथ और भी प्रखर होती चली गई।
रक्तदान का सफर – जीवन बचाने का संकल्प
पिछले 30 वर्षों से लगातार रक्तदान करना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। लेकिन नरेश शर्मा का यह संकल्प उनकी पहचान बन चुका है। उनका आंकड़ा आज 125 रक्तदानों तक पहुँच चुका है। यह केवल एक गिनती नहीं, बल्कि उन सैकड़ों-हजारों जीवन की कहानी भी है। जिनका जीवन एक निस्वार्थ व स्वेच्छिक रक्तदान की सेवा से स्वस्थ जीवन जी रहा है।
वे मानते हैं कि “रक्तदान सबसे बड़ा महादान है।” जब भी किसी अस्पताल, थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे या दुर्घटना-ग्रस्त रोगी को रक्त की आवश्यकता हुई, नरेश शर्मा बिना किसी हिचकिचाहट के वहाँ पहुँचे और रक्तदान किया।
प्लेटलेट्स दान – असहाय रोगियों का सहारा
केवल रक्तदान ही नहीं, उन्होंने कई बार प्लेटलेट्स डोनेशन भी किए। डेंगू और कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे रोगियों के लिए प्लेटलेट्स किसी अमृत से कम नहीं होते। नरेश शर्मा ने न सिर्फ खुद प्लेटलेट्स दिए, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए जागरूक किया। उनका मानना है कि “जब तक शरीर स्वस्थ है, तब तक किसी के जीवन को बचाने का अवसर व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।
नेत्रदान – अंधेरे में रोशनी का संकल्प
साल 2006 उनके जीवन में एक नया पड़ाव लेकर आया। उन्होंने नेत्रदान का संकल्प लिया। उनके इस निर्णय ने अनेक लोगों को प्रेरित किया। इससे पता चला कि मृत्यु के बाद भी इंसान किसी के जीवन में रोशनी बन सकता है। यह विचार उनके हृदय को गहराई तक छू गया। किसी अंधे व्यक्ति की दुनिया उनकी आँखों से रोशन हो सकती है।
शरीरदान – मृत्यु के बाद भी सेवा
साल 2015 में उन्होंने एक और बड़ा कदम उठाया और शरीरदान का रेजेस्ट्रेशन पत्र भरा। यह निर्णय दर्शाता है कि नरेश शर्मा की सेवा-भावना केवल जीवन तक सीमित नहीं है। बल्कि मृत्यु के बाद भी उनका शरीर समाज के लिए उपयोगी होगा। मेडिकल छात्रों के लिए उनके शरीर का उपयोग अध्ययन हेतु किया जाएगा। इससे भविष्य में असंख्य रोगियों का इलाज संभव हो सकेगा।
अंगदान – अमर सेवा का शपथपत्र
साल 2019 में उन्होंने अंगदान शपथपत्र भरकर प्रमाणित कर दिया कि उनका जीवन पूरी तरह मानवता को समर्पित है। यह कदम उनकी निस्वार्थ सेवा-भावना का चरम उदाहरण है। उनके लिए दान का अर्थ केवल संपत्ति या धन से नहीं है। बल्कि शरीर और आत्मा के हर हिस्से से सेवा करना है।
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए विशेष अभियान

पिछले तीन दशकों में उन्होंने सैकड़ों रक्तदान शिविर आयोजित किए। इनमें विशेष रूप से थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए रक्त की व्यवस्था की जाती रही। थैलेसीमिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज को बार-बार रक्त की आवश्यकता होती है। नरेश शर्मा ने न केवल स्वयं रक्तदान किया। बल्कि समाज में जागरूकता फैलाकर हजारों लोगों को इस पवित्र कार्य से जोड़ा।
असहाय और शोषितों की सेवा
उनका जीवन केवल रक्तदान तक सीमित नहीं है। असहाय, गरीब और शोषित लोगों की मदद करना भी उनका पहला कर्तव्य रहा है। चाहे कोई अनाथ बच्चा हो, कोई बुजुर्ग असहाय हो या कोई गरीब परिवार इलाज के अभाव में तड़प रहा हो – नरेश शर्मा हर जगह उम्मीद की किरण बनकर पहुचते है।
नरेश शर्मा का जज़्बा और जुनून
उनके भीतर का जज़्बा केवल सेवा करने तक सीमित नहीं है। बल्कि उन्होंने इस सेवा को समाज का आंदोलन बनाने का बीड़ा उठाया। उनका जुनून यह है कि हर व्यक्ति जीवन में कम से कम एक बार रक्तदान अवश्य करे। उनका मानना है कि “जिस दिन समाज का हर नागरिक दान का संकल्प लेगा, उस दिन किसी भी रोगी की मृत्यु नहीं होगी।” खासकर रक्त या अंगों की कमी से।
समाज के लिए प्रेरक संदेश
नरेश शर्मा की जीवन-गाथा हमें यह सिखाती है कि इंसान केवल अपने लिए नहीं होता। बल्कि समाज के लिए भी जन्म लेता है। उन्होंने यह साबित किया कि एक व्यक्ति भी समाज में क्रांति ला सकता है। उनके 125 रक्तदान केवल आंकड़े नहीं हैं। बल्कि उन अनगिनत परिवारों की मुस्कान हैं, जिन्हें उन्होंने जीवन दिया।
आज जब आधुनिकता के दौर में लोग स्वार्थ में डूबे रहते हैं, तब नरेश शर्मा जैसे जीवनरक्षक हमें यह याद दिलाते हैं कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने नेत्रदान, शरीरदान और अंगदान करके यह संदेश दिया कि मृत्यु के बाद भी जीवन की सेवा संभव है।
हम सबको यह समझना चाहिए कि रक्तदान करने से शरीर कमजोर नहीं होता। बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। नेत्रदान से किसी की अंधेरी दुनिया रोशन हो सकती है। अंगदान से कई जीवन एक साथ बचाए जा सकते हैं। शरीरदान से आने वाली पीढ़ियाँ चिकित्सा विज्ञान में नई ऊँचाइयों को छू सकती हैं।
👉 आइए, हम सभी नरेश शर्मा की तरह संकल्प लें –
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जीवन में नियमित रक्तदान करेंगे।
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नेत्रदान और अंगदान की शपथ लेंगे।
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मृत्यु के बाद भी अपने शरीर को समाज की सेवा के लिए समर्पित करेंगे।
याद रखें, “दान ही सच्चा धर्म है, और यही जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है।”
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