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समय रहते कैसे पहचानें कैंसर?   जानिए लक्षण, जोखिम, जांच और आधुनिक इलाज

समय रहते कैसे पहचानें कैंसर? जानिए लक्षण, जोखिम, जांच और आधुनिक इलाज

कैंसर का नाम सुनते ही मन में भय पैदा होना स्वाभाविक है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि कैंसर का अर्थ हमेशा जीवन का अंत नहीं होता। चिकित्सा विज्ञान ने कैंसर की जांच और उपचार में बड़ी प्रगति की है। कई प्रकार के कैंसर यदि शुरुआती अवस्था में पहचान लिए जाएं और उचित इलाज मिले, तो रोगी के स्वस्थ होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसलिए कैंसर से डरने के बजाय उसके संभावित संकेतों को समझना, समय पर जांच कराना और सही चिकित्सकीय सलाह लेना सबसे जरूरी है।

कैंसर क्या है और क्यों होता है?

हमारे शरीर में कोशिकाएं एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार बनती, बढ़ती और पुरानी होने पर नष्ट होती रहती हैं। जब किसी कोशिका के डीएनए या जीन में बदलाव के कारण वह अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती है, तब असामान्य कोशिकाओं का समूह बन सकता है। इसे ट्यूमर कहा जाता है। हालांकि प्रत्येक ट्यूमर कैंसर नहीं होता। कैंसरयुक्त कोशिकाएं आसपास के ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती हैं और रक्त या लसीका तंत्र के माध्यम से शरीर के दूसरे भागों तक फैल सकती हैं। इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस कहा जाता है।

कैंसर किसी एक कारण से नहीं होता। तंबाकू और उससे बने उत्पाद, धूम्रपान, शराब का अधिक सेवन, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित भोजन, वायु प्रदूषण, कुछ हानिकारक रसायन और अत्यधिक विकिरण इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ह्यूमन पैपिलोमावायरस यानी एचपीवी से गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर तथा हेपेटाइटिस-बी या सी से लिवर कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

बढ़ती आयु और परिवार में कैंसर का इतिहास भी महत्वपूर्ण जोखिम कारक हैं। फिर भी जोखिम होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से कैंसर होगा। इसी तरह स्वस्थ जीवनशैली अपनाने वाले व्यक्ति को भी कभी-कभी कैंसर हो सकता है।

कैंसर के संभावित शुरुआती लक्षण

कैंसर के लक्षण उसके प्रकार और प्रभावित अंग के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कई बार शुरुआती अवस्था में कोई स्पष्ट संकेत दिखाई नहीं देता। फिर भी निम्न बदलावों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए—

  • शरीर के किसी हिस्से में नई गांठ या सूजन होना।
  • बिना किसी प्रयास के लगातार वजन कम होना।
  • असामान्य कमजोरी और लंबे समय तक थकान रहना।
  • भूख कम होना या खाना निगलने में कठिनाई होना।
  • मुंह का ऐसा छाला जो लंबे समय तक ठीक न हो।
  • मुंह में लाल या सफेद धब्बे दिखाई देना।
  • लगातार खांसी, आवाज में भारीपन या खांसी के साथ खून आना।
  • पेशाब अथवा मल में खून दिखाई देना।
  • मल त्याग या पेशाब की आदतों में लगातार बदलाव होना।
  • किसी घाव का लंबे समय तक ठीक न होना।
  • तिल के आकार, रंग या बनावट में बदलाव आना।
  • स्तन में गांठ, आकार में बदलाव या निप्पल से असामान्य स्राव होना।
  • मासिक धर्म के बीच या रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव होना।
  • लगातार दर्द, बुखार या रात में अत्यधिक पसीना आना।

इन लक्षणों का होना कैंसर की पुष्टि नहीं है। संक्रमण, हार्मोन संबंधी बदलाव या दूसरी सामान्य बीमारियों में भी ऐसे संकेत दिखाई दे सकते हैं। लेकिन कोई बदलाव लगातार बना रहे, बढ़ता जाए या असामान्य रक्तस्राव हो, तो स्वयं दवा लेने के बजाय योग्य चिकित्सक से जांच करानी चाहिए।

किन लोगों को अधिक सतर्क रहना चाहिए?

तंबाकू, गुटखा, खैनी, बीड़ी, सिगरेट या हुक्का इस्तेमाल करने वालों में मुंह, गले और फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ता है। परिवार में कम उम्र में कैंसर के कई मामले होना, लंबे समय तक शराब का सेवन, मोटापा, व्यायाम की कमी, असुरक्षित धूप और हानिकारक रसायनों के संपर्क में रहना भी खतरा बढ़ा सकता है।

महिलाओं को स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के प्रति विशेष रूप से जागरूक रहना चाहिए। आयु, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर डॉक्टर मैमोग्राफी, एचपीवी जांच या पैप स्मीयर कराने की सलाह दे सकते हैं। प्रत्येक जांच हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं होती, इसलिए कैंसर स्क्रीनिंग डॉक्टर की सलाह और मान्य स्वास्थ्य दिशानिर्देशों के अनुसार ही करानी चाहिए।

कैंसर की जांच कैसे होती है?

डॉक्टर सबसे पहले रोगी के लक्षणों, पारिवारिक इतिहास और जीवनशैली के बारे में जानकारी लेते हैं। इसके बाद शारीरिक परीक्षण और आवश्यकता के अनुसार रक्त या मूत्र जांच, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई, मैमोग्राफी, एंडोस्कोपी या अन्य जांच कराई जा सकती हैं।

कैंसर की पुष्टि के लिए अक्सर संदिग्ध ऊतक का छोटा नमूना लेकर प्रयोगशाला में जांच की जाती है, जिसे बायोप्सी कहते हैं। कैंसर मिलने पर उसके प्रकार, आकार और शरीर में फैलाव को जानने के लिए उसकी स्टेज निर्धारित की जाती है। कुछ रोगियों में कैंसर से जुड़े विशेष जीन या बायोमार्कर की जांच भी की जाती है, जिससे अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत उपचार चुनने में सहायता मिलती है।

कैंसर का आधुनिक इलाज

कैंसर का इलाज उसके प्रकार, स्टेज, स्थान, रोगी की आयु और सामान्य स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। उपचार में ऑपरेशन द्वारा कैंसरयुक्त भाग को निकालना, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, हार्मोन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी तथा कुछ मामलों में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट शामिल हो सकते हैं। कई रोगियों में इन उपचारों का संयोजन दिया जाता है।

टार्गेटेड थेरेपी कैंसर कोशिकाओं की विशेष कमजोरियों को निशाना बनाती है, जबकि इम्यूनोथेरेपी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर से लड़ने में सहायता देती है। सभी आधुनिक उपचार हर रोगी के लिए उपयुक्त नहीं होते। इसलिए इलाज कैंसर विशेषज्ञ की देखरेख में ही होना चाहिए।

सावधान:
इंटरनेट पर बताए गए घरेलू नुस्खे, चमत्कारी दवाएं, झाड़-फूंक या अप्रमाणित उपचार कैंसर के मुख्य इलाज का विकल्प नहीं हैं। इनके कारण सही उपचार शुरू होने में देरी हो सकती है और रोग गंभीर अवस्था में पहुंच सकता है।

बचाव ही सबसे मजबूत कदम

तंबाकू का पूरी तरह त्याग, शराब से दूरी, संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, स्वस्थ वजन तथा प्रदूषण और हानिकारक रसायनों से बचाव कैंसर के जोखिम को कम कर सकते हैं। डॉक्टर की सलाह से हेपेटाइटिस-बी और एचपीवी टीकाकरण भी कुछ प्रकार के कैंसर से सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कई कैंसरों को जोखिम कारकों से बचाव, शुरुआती पहचान और उचित उपचार द्वारा रोका या सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। शरीर में कोई असामान्य बदलाव दिखाई दे तो घबराएं नहीं, लेकिन उसे अनदेखा भी न करें। समय पर चिकित्सकीय जांच के लिए उठाया गया एक छोटा कदम जीवन बचा सकता है।

कैंसर से डरना नहीं है—उसके संकेतों को पहचानकर समय पर जांच और इलाज कराना है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी लक्षण, जांच, दवा या उपचार के संबंध में योग्य चिकित्सक अथवा कैंसर विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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