रक्तदान, करुणा और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक – समाजसेवी व रक्तदाता नरेश शर्मा की कहानी
हिमाचल प्रदेश की पवित्र वादियों में, जहाँ प्रकृति की गोद में करुणा, त्याग और सेवा का अमृत बहता है — वहीं एक ऐसे व्यक्तित्व, जिनके जीवन का हर क्षण दूसरों के लिए समर्पित है — नरेश शर्मा।
शिमला जिले की तहसील ठियोग की ग्राम सरिवन (मझौली) में जन्मे नरेश शर्मा पिछले तीन दशकों से असहाय, पीड़ित व बीमार लोगो के जीवन की सुरक्षा के लिए निरन्तर – निस्वार्थ रूप से कार्य कर रहे हैं।
रक्त की हर बूंद से जीवन बचाने वाला अभियान
लगभग तीन दशक पहले, जब उन्होंने पहली बार रक्तदान किया, तब उन्हें नहीं पता था कि यही एक कदम उनके जीवन की दिशा बदल देगा।
उस एक रक्तदान ने उन्हें जीवनभर के मिशन से जोड़ दिया।
आज, 125 से अधिक बार रक्तदान कर चुके नरेश शर्मा ने न केवल स्वयं रक्त दिया, बल्कि हजारों लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित भी किया हैं।
पिछले 30 वर्षों से वे “थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों” के लिए निरंतर रक्तदान शिविर आयोजित कर रहे हैं।
उनकी सोच सरल है —
“रक्तदान केवल दान नहीं, जीवन का पुनर्जन्म है।”
उनके नेतृत्व में यह मुहिम केवल हिमाचल तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत के 19 राज्यों तक फैल चुकी है।
उन्होंने अयोध्या, हरिद्वार, उज्जैन, कोलकाता, ज्वालाजी, कुरुक्षेत्र जैसे धार्मिक स्थलों पर रक्तदान करके इस “सेवा यज्ञ” का रूप दिया हैं।
असहायों की आवाज़ और शोषितों की शक्ति
नरेश शर्मा का जीवन एक खुली किताब की तरह है — जिसमें हर पृष्ठ पर “सेवा”, “सहानुभूति” और “संकल्प” लिखा है।
वे असहाय, पीड़ित, बीमार और शोषित लोगों के लिए निरंतर कार्य करते हैं।
कभी किसी गरीब मरीज को रक्त पहुँचाते हैं,
कभी किसी बेसहारा बच्चे को शिक्षा सामग्री देते हैं,
तो कभी वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों के बीच बैठकर उन्हें स्नेह का सहारा देते हैं।
उनका उद्देश्य केवल सहायता करना नहीं, बल्कि समाज में संवेदना का भाव जगाना है — ताकि हर व्यक्ति अपने भीतर छिपे मानव को पहचान सके।
नशा मुक्ति राष्ट्र – युवाओं के लिए प्रेरक अभियान
“नशा छोड़ो, राष्ट्र जोड़ो” — यही उनका नारा है।
उन्होंने नशा मुक्ति राष्ट्र अभियान के तहत हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और अन्य राज्यों में असंख्य जागरूकता कार्यक्रम किए हैं।
वे युवाओं से कहते हैं —
“हाथों में सिरिंज नहीं, किताबें होनी चाहिए; नसों में नशा नहीं, देशभक्ति का खून दौड़ना चाहिए।”
उनके ये शब्द सिर्फ प्रेरणा नहीं, बल्कि एक चेतना हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी फैल रही है।
बेटियों के प्रति समर्पण
नरेश शर्मा के जीवन का एक कोमल लेकिन सबसे मजबूत पहलू है — बेटियों के प्रति सम्मान और संवेदना।
वे बेटियों को शक्ति और संस्कार का प्रतीक मानते हैं।
गरीब परिवारों की बेटियों के लिए वे शिक्षा सामग्री, यूनिफॉर्म, और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराते हैं।
उनकी अपनी पुत्री अनन्या शर्मा उनके लिए प्रेरणा का स्रोत हैं — वो मानते हैं कि हर बेटी समाज की असली रोशनी है, जिसे सुरक्षा और सम्मान देना हर नागरिक का कर्तव्य है।
पर्यावरण, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति दायित्व
नरेश शर्मा मानते हैं कि देशभक्ति केवल सीमा पर खड़े सैनिक तक सीमित नहीं —
बल्कि हर वह व्यक्ति देशभक्त है जो प्रकृति, पर्यावरण और मानवता की रक्षा करता है।
वे निरंतर वृक्षारोपण अभियान, सफाई अभियान, और जल संरक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हैं।
उनका संदेश है —
“देश की सेवा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि पेड़ लगाकर, प्रकृति बचाकर भी होती है।”
सम्मान और उपलब्धियाँ
उनके जीवन की तपस्या को अनेक संस्थानों और सरकारों ने सम्मानित किया है —
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हिमाचल प्रदेश के चार मुख्यमंत्रियों — श्री वीरभद्र सिंह, प्रेम कुमार धूमल, शांताकुमार, और जयराम ठाकुर द्वारा सम्मानित हैं।
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चार अलग-अलग राज्यपालों द्वारा राज्य स्तर पर प्रशंसा।
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भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के द्वारा सम्मान प्राप्त।
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देश के 19 राज्यों से 200 से अधिक प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार प्राप्त।
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अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रक्तदान संस्थाओं द्वारा विशेष सम्मान।
फिर भी वे कहते हैं —
“सम्मान तो क्षणिक होता है, लेकिन किसी असहाय की मुस्कान जीवनभर का आशीर्वाद देती है।”
लेखक और विचारक – “जीवनरक्षक” पुस्तक
सेवा केवल कर्म से नहीं, विचार से भी निभाई जाती है।
इसी सोच से उन्होंने अपनी सेवा यात्रा को शब्दों में ढाला —
“जीवनरक्षक: मानवता, राष्ट्र और प्रकृति की रक्षा की गाथा” नामक पुस्तक के रूप में।
यह पुस्तक समाज में जागरूकता, प्रेरणा और संवेदना का संगम है।
अब तक इसकी सैंकड़ों प्रतियाँ बिक चुकी हैं —
जो इस बात का प्रमाण है कि नरेश शर्मा जी के विचारों ने हजारों हृदयों को छुआ है।
मेजर वी. डी. कुठियाला जी और पद्मश्री जगदीश बाबा जी की प्रेरणा
नरेश शर्मा जी के जीवन में दो महापुरुषों की प्रेरणा ने निर्णायक भूमिका निभाई —
मेजर वी. डी. कुठियाला जी और पद्मश्री जगदीश बाबा जी।
सबसे पहले वे अपने रक्तदान गुरु मेजर वी. डी. कुठियाला जी से शिमला के कॉलेज में मिले।
कुठियाला जी, जो भारतीय सेना से रिटायर होकर अंग्रेज़ी के प्रोफेसर बने,
वे शिमला में तीन-चार दशक पहले रक्तदान शिविरों के प्रवर्तक रहे।
उनकी अनुशासित, सेवाभावी और देशभक्त जीवनशैली ने नरेश जी पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
उनसे उन्होंने सीखा —
“रक्तदान केवल दान नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति है।”
बाद में जब नरेश शर्मा जी चंडीगढ़ में नौकरी करने आए,
तो उनकी मुलाकात पद्मश्री जगदीश बाबा जी से हुई —
जो PGI हॉस्पिटल के बाहर 40 वर्षो से अधिक चल रहे लंगर सेवा अभियान के प्रणेता थे।
नरेश जी ने लगभग 10–12 वर्षों तक बाबा जी के साथ सेवा की,
जहाँ रोज़ सैकड़ों रोगियों के परिजनों को भोजन कराया जाता था।
उनके जीवन पर बाबा जी के ये शब्द अमिट हैं —
“सच्ची पूजा किसी मंदिर में नहीं, बल्कि भूखे के पेट में है।”
इन दोनों गुरुओं की प्रेरणा ने उनके जीवन को सेवा, करुणा और त्याग का स्वरूप दे दिया।
“मेजर कुठियाला जी ने रक्त से सेवा सिखाई,
और जगदीश बाबा जी ने करुणा से जीवन भर दिया।”
जीवन संघर्ष और आत्मनिर्भरता
नरेश शर्मा जी ने जीवन के अनेक पड़ावों में सरकारी और निजी संस्थाओं में कार्य किया।
वे गुरुग्राम, चंडीगढ़, जीरकपुर, जालंधर, परवाणु आदि शहरों में नौकरी करते हुए भी जनसेवा से जुड़े रहे हैं।
पर हर दिन किसी न किसी रूप में सेवा का कार्य करते हैं।
वे कहते हैं —
“रोटी अपने लिए बनाना जरूरी है, पर एक रोटी दूसरों के लिए बचा लेना ही मानवता है।”
सम्मान से अधिक सेवा का सुख
उनके लिए सेवा का अर्थ पुरस्कार नहीं, बल्कि मन की शांति और आत्मिक संतोष है।
वे कहते हैं —
“सम्मान मुझे नहीं चाहिए, मुझे वो मुस्कान चाहिए जो किसी असहाय के चेहरे पर लौट आए।”
उनकी हर उपलब्धि का मूल आधार यही भाव है —
“मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।”
शिक्षा
नरेश शर्मा का जीवन सिखाता है कि सेवा, करुणा और त्याग ही सच्ची पूजा हैं।
उन्होंने यह साबित किया कि किसी बड़े पद, धन या शक्ति की आवश्यकता नहीं —
अगर हृदय में संवेदना और निष्ठा हो तो एक व्यक्ति भी समाज में क्रांति ला सकता है।
उन्होंने रक्तदान को समाज का उत्सव बनाया,
असहायों को आवाज़ दी,
और युवाओं में राष्ट्रप्रेम की ज्योति जलाई।
उनका जीवन हमें यह सीख देता है कि मानवता शब्द नहीं, एक आचरण है।
नशा मुक्ति, बेटियों की शिक्षा, पर्यावरण रक्षा और रक्तदान —
इन सभी क्षेत्रों में उनका कार्य हमें प्रेरित करता है कि
“देश की सच्ची सेवा वहीं है जहाँ किसी की पीड़ा कम हो जाए।”
उनका संदेश सरल पर गहरा है —
“जीवन छोटा है, पर इसे किसी के काम आकर अमर बनाया जा सकता है।”
सेवा सबसे बड़ा धर्म है, और करुणा उसका मंदिर।
यही है — नरेश शर्मा का जीवन संदेश।
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