केंद्र के फैसले से किसानों में बढ़ी चिंता
केंद्र सरकार द्वारा अमेरिका से 80 रुपये प्रति किलो की दर से सेब आयात करने के निर्णय ने हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों में गहरी चिंता पैदा कर दी है। किसानों का कहना है कि यह फैसला सीधे-सीधे स्थानीय बागवानी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि हिमाचल की बड़ी आबादी सेब उत्पादन पर निर्भर है। राज्य की पहाड़ी जलवायु और वर्षों की मेहनत से तैयार हुई बागवानी व्यवस्था अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा के सामने खड़ी दिखाई दे रही है। किसानों का तर्क है कि यदि विदेशी सेब समान या कम कीमत पर बाजार में उपलब्ध होगा, तो स्थानीय सेब की मांग घट सकती है। इससे न केवल किसानों की आय पर असर पड़ेगा, बल्कि मजदूरों, पैकिंग, ट्रांसपोर्ट और मंडियों से जुड़े हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी प्रभावित हो सकती है। इसी कारण किसान संगठनों ने इस निर्णय पर पुनर्विचार की मांग उठाई है।
भारत-अमेरिका समझौते के बाद बदली स्थिति
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद सेब आयात की शर्तों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया है, जिससे विदेशी सेब के भारत आने की राह आसान हो गई है। हालांकि न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) को 50 रुपये प्रति किलो से बढ़ाकर 80 रुपये कर दिया गया है, फिर भी किसानों को आशंका है कि इसका लाभ आयातकों को अधिक मिलेगा। समझौते के अनुसार अमेरिकी सेब भारत में लगभग 100 रुपये प्रति किलो की दर से पहुंचेगा। यह वही कीमत है, जिस पर हिमाचल का उच्च गुणवत्ता वाला सेब बाजार में बिकता है। ऐसे में किसानों को डर है कि उनका प्रीमियम सेब अपनी पहचान और कीमत दोनों खो सकता है। इस बदलाव ने स्थानीय बागवानों को भविष्य की बाजार प्रतिस्पर्धा को लेकर असमंजस में डाल दिया है।
प्रीमियम सेब को मिलेगी कड़ी टक्कर
संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान का मानना है कि इस फैसले का सबसे बड़ा असर प्रीमियम गुणवत्ता वाले सेब पर पड़ेगा। उनका कहना है कि यदि विदेशी और घरेलू सेब की कीमत लगभग समान रहेगी, तो उपभोक्ता आकर्षक पैकिंग और चमकदार दिखने वाले आयातित सेब को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे स्थानीय सेब की बिक्री पर सीधा असर पड़ेगा। प्रीमियम सेब ही किसानों की आय का मुख्य आधार होता है, क्योंकि इससे उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं और पूरे सीजन की कमाई तय होती है। यदि इसी वर्ग के सेब को बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा, तो किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है। चौहान का कहना है कि यह सिर्फ एक उत्पाद का सवाल नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी कृषि तंत्र और उससे जुड़े लाखों लोगों के भविष्य का मुद्दा है।
सीए स्टोर व्यवस्था पर खतरा
किसानों ने यह भी आशंका जताई है कि इस फैसले का असर नियंत्रित वातावरण (सीए) भंडारण व्यवस्था पर पड़ेगा। सीए स्टोर में सेब को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है, ताकि बाद में अच्छे दाम मिलने पर उसे बाजार में उतारा जा सके। लेकिन यदि बाजार में उसी समय सस्ते आयातित सेब उपलब्ध होंगे, तो स्थानीय सेब को अपेक्षित कीमत नहीं मिल पाएगी। किसानों का कहना है कि वे 85–90 रुपये प्रति किलो की दर से प्रीमियम सेब खरीदकर उसे भंडारण में रखते हैं, जिसमें बिजली, रखरखाव और परिवहन जैसी लागत भी जुड़ती है। बाद में उसे बाजार में अधिक कीमत पर बेचना पड़ता है, तभी लागत निकलती है। यदि अमेरिकी सेब कम कीमत पर उपलब्ध होगा, तो यह पूरी भंडारण प्रणाली आर्थिक रूप से अस्थिर हो सकती है और किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
आयात मूल्य पर किसानों के सवाल
किसानों ने इस बात पर भी सवाल उठाए हैं कि समझौते से पहले अमेरिकी सेब 75 रुपये प्रति किलो पर भारत पहुंच रहा था। उनका कहना है कि यदि वास्तव में ऐसा था, तो बाजार में वही सेब 200 से 250 रुपये प्रति किलो कैसे बिक रहा था। किसानों के अनुसार आयात और खुदरा कीमतों के बीच का यह बड़ा अंतर कई सवाल खड़े करता है। उनका मानना है कि आयात के वास्तविक आंकड़े और बाजार की स्थिति के बीच पारदर्शिता की कमी है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि सरकार विदेशी सेब को बढ़ावा देगी, तो स्थानीय किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा और भी कठिन हो जाएगी। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मुद्दे पर स्पष्ट नीति बनाई जाए और आयात से पहले स्थानीय किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाए।
प्रोग्रेसिव ग्रोअर्स एसोसिएशन की राय
प्रोग्रेसिव ग्रोअर्स एसोसिएशन (पीजीए) के अध्यक्ष लोकिंदर बिष्ट का कहना है कि इस फैसले से स्थानीय प्रीमियम सेब की कीमतों पर सीधा असर पड़ेगा। उनका मानना है कि एमआईपी और 20 प्रतिशत आयात शुल्क से नुकसान कुछ हद तक सीमित रह सकता है, लेकिन यह पूरी सुरक्षा नहीं दे पाएगा। बिष्ट का कहना है कि यदि विदेशी सेब समान कीमत पर उपलब्ध होगा, तो स्थानीय प्रीमियम सेब को बेहतर दाम नहीं मिल पाएंगे। इसका असर धीरे-धीरे निम्न गुणवत्ता वाले सेब पर भी पड़ेगा और पूरे बाजार का संतुलन बिगड़ सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों की सुरक्षा के लिए एमआईपी कम से कम 100 रुपये प्रति किलो होना चाहिए था, ताकि विदेशी सेब से प्रतिस्पर्धा नियंत्रित रह सके और स्थानीय उत्पादन को उचित संरक्षण मिल सके।
असीमित आयात से अर्थव्यवस्था को खतरा
किसान संगठनों का कहना है कि यदि कम शुल्क पर विदेशी सेब का असीमित आयात हुआ, तो यह हिमाचल की बागवानी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। सेब उत्पादन राज्य की रीढ़ माना जाता है और इससे हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। यदि बाजार में विदेशी सेब की भरमार हो गई, तो स्थानीय उत्पादकों को अपने सेब के उचित दाम नहीं मिल पाएंगे। इससे खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है और कई किसान बागवानी छोड़ने पर मजबूर हो सकते हैं। संगठनों का मानना है कि सरकार को आयात की मात्रा पर सीमा तय करनी चाहिए और ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिससे स्थानीय किसानों की मेहनत और आजीविका सुरक्षित रह सके।
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