हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर – थीम पर सजा महामाया स्कूल का वार्षिकोत्सव

सम्मान के रंगों से सजा समारोह

सुबह से ही विद्यालय प्रांगण में उल्लास और ऊर्जा का वातावरण था। बच्चे पारंपरिक पोशाकों में सजे हुए थे, और दीवारों पर रंग-बिरंगे पोस्टर बच्चों के हाथों से बने संदेश लिए हुए थे — “बुजुर्गों का आशीर्वाद सबसे बड़ी दौलत है” और “जिनके पास बुजुर्ग हैं, उनके घर में भगवान हैं।”
समारोह के आरंभ में दीप प्रज्वलन हुआ, और विद्यालय के नन्हे विद्यार्थियों ने मंगलगान प्रस्तुत किया। इसके बाद विद्यालय परिवार ने अपने क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिकों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों, शिक्षकों और समाजसेवियों को सम्मानपूर्वक मंच पर आमंत्रित किया। प्रत्येक बुजुर्ग को टोपी, मफलर और शॉल भेंट कर अभिनंदन किया गया। जब छोटे-छोटे बच्चों ने अपने दादा-दादी जैसे वरिष्ठों के चरण छुए, तो मंच और दर्शकदीर्घा दोनों भावनाओं से भर उठे।
कई बुजुर्गों की आंखों में गर्व और खुशी के आँसू थे। यह दृश्य केवल एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि संवेदनाओं की साझी अनुभूति बन गया। विद्यालय का हर कोना यह संदेश दे रहा था कि “सम्मान वही है, जो दिल से किया जाए।”
प्रबंधन का संदेश — जड़ों से जुड़ना ही शिक्षा है
विद्यालय के प्रबंध निदेशक श्री सुरजीत शर्मा ने अपने संबोधन में कहा —
आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में आधुनिकता ने सुविधाएँ तो बढ़ाई हैं, लेकिन रिश्तों में दूरी भी बढ़ाई है। बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि हमारे बुजुर्ग हमारी जड़ हैं — और जड़ों से जुड़े रहना ही असली शिक्षा है। यदि बच्चे अपने बड़ों का सम्मान करना सीख जाएं, तो यही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।
उन्होंने यह भी कहा कि महामाया पब्लिक स्कूल का उद्देश्य केवल शैक्षणिक प्रगति नहीं, बल्कि चरित्र और संस्कारों का निर्माण है। यही कारण है कि विद्यालय हर वर्ष ऐसे विषयों पर आयोजन करता है, जो समाज में मानवीयता, संवेदना और परंपरा को सशक्त बनाएं।
अतिथियों के प्रेरक विचार
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री प्रवीण वर्मा, कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष, ने कहा —
“महामाया स्कूल ने यह सिद्ध कर दिया कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं होती। यह वह शक्ति है जो बच्चों को जीवन के वास्तविक मूल्यों से जोड़ती है। आज जब समाज में मूल्य क्षीण हो रहे हैं, तब ऐसे कार्यक्रम हमारी संस्कृति की आत्मा को पुनर्जीवित करते हैं।”
समाजसेवी नरेश शर्मा – मानवता के सच्चे साधक, राष्ट्रसेवा के प्रतीक

विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित समाजसेवी नरेश शर्मा ने इस अवसर पर बच्चों और अभिभावकों को अपने जीवन से जुड़ी प्रेरक बातें साझा कीं। वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और राष्ट्रप्रेम की जीवित मिसाल हैं। नरेश शर्मा अब तक 125 बार स्वैच्छिक रक्तदान कर चुके हैं — यह कोई आकस्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि तीन दशकों से निरंतर चल रही मानवता की साधना का परिणाम है।
पिछले तीन दशकों से लगातार रक्तदान करते हुए नरेश शर्मा ने भारत के अनेक राज्यों — हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार — में सक्रिय भागीदारी निभाई है। वे न केवल रक्तदाता हैं, बल्कि समाज में रक्तदान, नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सेवा-भावना के क्षेत्र में कई अभियानों के अग्रणी रहे हैं।
उनका कार्यक्षेत्र केवल स्थानीय नहीं रहा; वे कई प्रतिष्ठित सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर रक्तदान जागरूकता, थैलेसीमिया नियंत्रण और सामाजिक एकता के क्षेत्र में काम करते रहे हैं। भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम), लायंस क्लब और अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ उनका जुड़ाव उन्हें समाज में एक आदर्श व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
वे भारत का प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने भारतीय समाज की सेवा-परंपरा और रक्तदान की संस्कृति को उजागर किया। नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी वे भारतीय रक्तदाताओं के प्रतिनिधि के रूप में सम्मानित रहे हैं।
“बच्चों के मन में सम्मान की भावना तभी पनपती है जब वे समाज से उदाहरण देखते हैं। बुजुर्ग केवल अनुभव का स्रोत नहीं, बल्कि उस जीवन-दर्शन के प्रतीक हैं जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देता है। किताबें ज्ञान दे सकती हैं, पर जीवन की समझ बुजुर्गों के अनुभवों से ही आती है।”
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे अपने माता-पिता, दादा-दादी और शिक्षकों से संवाद करें, उनके अनुभवों से सीखें और उनके जीवन संघर्ष को समझें। उन्होंने कहा —
“जो पीढ़ी अपने बुजुर्गों को याद रखती है, वही समाज की पहचान और संस्कार को सहेजती है।”
उनका सादा व्यक्तित्व, विनम्र स्वभाव और सेवा के प्रति समर्पण आज की युवा पीढ़ी के लिए एक जीवंत उदाहरण है। वे मानते हैं कि “सेवा ही सच्ची साधना है” — और यही सोच उन्हें हर मंच पर भारत की पहचान के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
संस्कृति से ओतप्रोत प्रस्तुतियाँ

समारोह का सांस्कृतिक पक्ष अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली रहा। बच्चों ने देशभक्ति गीत, नृत्य, कविताएँ और नाट्य मंचन के माध्यम से सम्मान और संस्कार के संदेश दिए। “माता-पिता की सेवा” विषय पर आधारित नाटक ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
प्रधानाचार्या का संदेश – संवेदनशील नागरिक बनें

“इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में संवेदना और संस्कारों के बीज बोना है। हम चाहते हैं कि बच्चे जीवन में केवल सफल नहीं, बल्कि विनम्र, कृतज्ञ और संवेदनशील नागरिक बनें। किसी भी समाज की पहचान उसकी नई पीढ़ी के व्यवहार से होती है, और यदि वह अपने बड़ों का आदर करना जानती है, तो वह समाज कभी पतन की ओर नहीं जाता।”
बुजुर्गों की आशीष से पावन हुआ विद्यालय परिसर
सम्मान समारोह के बाद सभी अतिथियों और बुजुर्गों ने विद्यालय परिसर का भ्रमण किया और बच्चों से संवाद किया। कई वरिष्ठ नागरिकों ने विद्यालय की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह आयोजन “नयी पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने की अद्भुत शुरुआत” है।
“आज ऐसा लगा जैसे हम अपने पुराने स्कूल लौट आए हैं। बच्चों की आँखों में जो सम्मान देखा, वह जीवनभर याद रहेगा।”
एक नई परंपरा की शुरुआत

कार्यक्रम के अंत में विद्यालय परिवार ने यह घोषणा की कि “हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर” अब प्रत्येक वर्ष नियमित रूप से मनाया जाएगा। विद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने संकल्प लिया कि वे अपने क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सेवा, सम्मान और सहयोग की भावना को आगे बढ़ाएंगे।
विद्यालय प्रबंधन ने यह भी कहा कि इस आयोजन से बच्चों में जो भाव जागृत हुआ है, वह केवल एक दिन का नहीं बल्कि जीवनभर का संस्कार बनेगा। यह पहल समाज में एक सकारात्मक सोच और संवाद की दिशा खोलती है — एक ऐसा समाज जहाँ पीढ़ियों के बीच दूरी नहीं, समझ और स्नेह का सेतु हो।
निष्कर्ष – संस्कार ही सच्ची धरोहर
महामाया पब्लिक स्कूल का यह वार्षिकोत्सव केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि संस्कार और संस्कृति के उत्सव का उदाहरण बन गया। यह आयोजन आने वाले समय में अन्य विद्यालयों और समाज के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होगा।
“बुजुर्ग केवल अतीत का अनुभव नहीं, बल्कि वर्तमान की दिशा और भविष्य की नींव हैं।”

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